आदि शंकराचार्य ने भारतीय सनातन परम्परा को पूरे देश में फैलाने के लिए भारत के चारो कोनों में चार मठों की स्थापना की थी। ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परम्परा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं जो इस प्रकार से हैं
श्रृंगेरी मठ- श्रृंगेरी शारदा पीठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में
गोवर्धन मठ-गोवर्धन मठ उड़ीसा के पुरी में शारदा मठ- द्वारिका को शारदा मठ के नाम से भी जाना जाता है जो द्वारिका गुजरात में है
ज्योतिर्मठ- ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में
आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों के अलावा पूरे देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की भी स्थापना की थी
इन चारों मठों के साथ ही यहाँ चार धाम भी हैं जहाँ हर सनातनी एक बार अवश्य जाना चाहता है
द्वारिका रेलवे स्टेशन, देश के सभी भागों से ट्रेन द्वारा जुड़ा हुआ है। अहमदाबाद से होकर आने वाली ट्रेनें इसको देश के अन्य भागों से जोड़ती हैं। यात्रा तिथि तय होते ही मैंने वाराणसी से ओखा की ट्रेन बुक कर ली जो द्वारिका होकर जाती है यह हमें सुबह द्वारिका उतार देती है। इस यात्रा के लिए मैंने क्रिसमस और नववर्ष की छुट्टियों को ध्यान में रखते हुए उस भीड़ से बचने के लिए इस तरह यात्रा प्लान किया कि हम 3 जनवरी के बाद वहां पहुंचें। पाँच घन्टे की देरी से जब हम द्वारिका पहुँचे तो स्टेशन से बाहर निकलते ही तमाम आटो रिक्शा वालों ने घेर लिया हैं कनानी जी ने पहले ही हमारे लिए धर्मशाला बुक कर दी थी तो हम सीधे अपनी धर्मशाला की ओर चल दिए। कनानी जी कमरे पर भी आए और हम लोगों के लिए चाय भी भेजवा दी। नवम्बर से फरवरी तक द्वारिका का मौसम घूमने के लिए आदर्श मौसम है ऐसा हमने पढ़ा था और वैसा मिला भी ... जनवरी की दोपहर में हाफ टी शर्ट और गुलाबी ठंड सी शाम उत्तर भारतीयों को आश्चर्य जनक ही लगेगा। नहाने के लिए भी गर्म पानी बहुत अधिक जरूरत नही पड़ती।
दोपहर 1 बजे से 5 बजे तक मन्दिर बन्द रहता तो हम नहा धोकर तैयार होने के बाद खाना खाने के लिए चल दिए क्योंकि 35 घन्टे की रेल यात्रा के बाद सबको तेज भूख लगी थी। द्वारिका के खाने की पहचान है गुजराती थाली जिसके साथ छाछ भरपूर मिलती है... हाँ हर खाने में आपको मीठापन जरूर मिलेगा जिससे हम उत्तर भारतीय जल्द ही ऊब जाते हैं पर विकल्प मौजूद होते हैं...यहाँ पंजाबी ढाबे भी मिलेंगे जो आपको तीखे चटपटे खाने की कमी नही होने देगें।
अब बात आती है कि द्वारिका गए हैं तो कहाँ कहाँ घूमे द्वारिका का पहला आकर्षण तो द्वारिकाधीश का मन्दिर ही है पर साथ ही यहाँ बच्चों के साथ मस्ती कर सकें ..ऐसी जगहें भी मौजूद हैं नही तो बच्चे ऊब ही जाएंगे। द्वरिका में भगवान कृष्ण को राजा की तरह पूजा जाता है इसलिए यहाँ द्वारिकाधीश हैं उनका भव्य मन्दिर राजा के निवास की तरह लगता भी हैं। दर्शन का तरीका यह है कि मन्दिर पहुँच कर गेट के बगल में स्थित काउन्टर पर जूते चप्पल दिए गए झोले में रखकर टोकन ले लीजिये फिर बगल के ही काउन्टर पर बैग और मोबाइल, कैमरा व चमड़े के बेल्ट आदि जमा करके दर्शन की लाइन में लग जाइए दर्शन आराम से हो जाते हैं... । यहाँ प्रभु को बालू शाही की तरह मिठाई, माखन, मिश्री के साथ तुलसी जी की माला चढ़ती है। मन्दिर में काले पत्थर का बने द्वारिकाधीश जी बड़े ही आकर्षक लगते हैं जिनकी आँखे अधखुली सी हैं। हम मन्दिर में शाम को पहुँचे तो आरती का समय था। हमारे साथ में कनानी जी ने अपने एक परिचित पुजारी जी को लगा दिया था उनके निर्देशन में भव्य दर्शन हुए । आरती में शामिल होने के बाद हम वहीं मन्दिर परिसर में ही बैठ गए... और मन्दिर को निहारते हुए कब घण्टों बीत गए पता भी नही चला। यहां बाहर से प्रसाद लेने की जरूरत नहीं है अंदर मंदिर परिसर में ही द्वारकाधीश मंदिर ट्रस्ट द्वारा प्रसाद के पैकेट दिए जाते हैं जिसका न्यूनतम मूल्य ₹100 है। यहाँ परिसर में बहुत से मंदिर है साथ ही यहाँ चार पीठों में से एक शारदा पीठ भी स्थित है जिसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपने हाथों से की थी।इसे बड़े ही सुन्दर पत्थर की नक्काशी के साथ पुनःनिर्मित किया गया है।
एक रूचिकर विषय इस मन्दिर पर लगने वाली पताका भी है जिसे द्वारिकाधीश की पगड़ी माना जाता है जो दिन में 5 बार बदलती है हमारा ध्यान हर समय इस पर था और हमने एक बार इसको लगाते भी देख लिया जो बड़ा ही साहस वाला काम लगा। हमने अगली सुबह गोमती नदी की ओर स्थित मोक्ष द्वार से प्रवेश किया यह मन्दिर का दूसरा द्वार है यहाँ से निकलकर आप गोमती नदी व त्रिवेणी संगम की ओर जा सकते हैं।
रात की रोशनी में मन्दिर और भी सुन्दर व भव्य लगता है पूरा मन्दिर परिसर बहुत ही साफ़ सुथरा है । शेष अगली कड़ी में.....
दोपहर में द्वारिकाधीश मन्दिर(द्वारिका धाम)
श्री शारदापीठ द्वारिका
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें