केदारनाथ यात्रा ;त्रासदी के बाद
केदारनाथ धाम उत्तराखंड के चार धाम व भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है । केदारनाथ में आए जल प्रलय के बाद की गयी यह यात्रा काफी रोमांचक रही व मित्र अमृत जी व सोनू जी के साथ होने से ही संभव हो पायी । जून 2013 की त्रासदी में केदारनाथ पैदल यात्रा के प्रारम्भ स्थल गौरीकुण्ड के तबाह होने के कारण 5 किमी पहले सोनप्रयाग में ही यात्रियों को रोक दिया जा रहा था वहाँ से 5 किलोमीटर पैदल या शटल जीप सेवा द्वारा गौरीकुण्ड पहुँच कर यात्रा प्रारंभ करना था ।
हमने सोनप्रयाग में ही यात्री निवास खोजकर सामान रख दिया। बगल के ही एक दो मंजिला होटल को हेलीकाप्टर सेवा के कर्मचारियों ने अपना आवास बना रखा था और तीन लड़के इसके संचालक थे । बातचीत में उन्होंने बताया कि वह नीचे कहीं कालेज में पढ़ते थे और यात्रा सीजन में कुछ कमाई के लिए होटल किराए पर लेकर चलाते हैं यहाँ वही मैनेजर थे वही कुक थे और वही वेटर। मुझे इसमें उत्तराखंड के पर्वतीय गाँवो की पलायन समस्या का एक संभव समाधान पर्यटन में होने की झलक दिखी।
हमने उस होटल की छत पर कुर्सियों पर डेरा जमा लिया और चाय की चुस्कियों के साथ हम चारो तरफ फैले नजारों में खो गए। हेलीकाप्टर लगातार चक्कर लगा रहे थे । इसी दौरान रात के खाने के लिए भी उन्हीं लड़कों ने हामी भर दी और जब खाने का समय आया तो ठंड लगने लगी थी और हम लकड़ी के चूल्हे के सामने खड़े हो गए । लकडी के चूल्हे पर बनी रोटियाँ गजब का स्वाद दे रही थीं। उन्हीं लड़कों ने बताया कि श्रद्धालुओं की यह रौनक बस दो-ढाई (मई- जून) महीने के यात्रा सीजन में ही है, उसके बाद तो इस समय 1000 -1200 रूपये वाले कमरों को कोई 200 में भी नही पूछता।
रात हो जाने पर दिनभर की थकावट से हम बिस्तर पर लेटते ही सो गए। भोर में उठकर हमने होटल में ही नहा लिया और पैदल यात्रा पर निकल लिए । बाहर अभी अन्धेरा था हम पैदल ही सोनप्रयाग के पुल को पार कर आगे बढ़ने लगे तभी शटल जीप आती दिखाई दी उसने हम पैदल यात्रियों को बैठाया और वापस गौरीकुण्ड के लिए मुड़ गयी।
सुबह हो चुकी थी और हम गौरीकुण्ड में थे । गौरीकुंड से केदारनाथ धाम का पैदल मार्ग मंदाकिनी के तरफ दायें किनारे से जाता है । गौरीकुण्ड एक छोटा यात्रा पड़ाव है और 2013 की त्रासदी के निशान यहाँ भी थे। अपनी पढी गयी जानकारी के अनुसार मैं गर्म कुण्डों को खोजने लगा पर वह सब त्रासदी में मलबे में दब चुके थे पर प्रशासन ने कुछ गर्म सोतों में पाईप लगाकर नहाने की जगह बना रखी थी।
गौरीकुण्ड में चाय पानी करके हम आगे बढ़े | यहाँ से आगे मंदाकिनी नदी गहरी घाटी बनाकर बहती दिखती है और उसके एक किनारे पर यात्रा मार्ग है । रामबाड़ा तक हम मंदाकिनी कि दाएँ किनारे पर चलते हैं । त्रासदी से पहले रामबाड़ा एक प्रमुख यात्री पड़ाव था जो अब पूरी तरह समाप्त हो चुका था और रामबाड़ा से केदारनाथ तक का पुराना मार्ग भी अनुपयोगी हो चुका था । नया मार्ग अब रामबाड़ा से पुल द्वारा मंदाकिनी नदी पार करके उसके बायें किनारे की तरफ उँचाई चढ़ते हुए जो लिंचोली होते हुए जाता है । यह मार्ग काफी तीखी चढाई वाला है । केदारनाथ यात्रा की पैदल दूरी भी नए रास्ते के कारण बढ़कर अब एकतरफ 20 किमी हो गयी है।
रास्ते में जंगल, झरने, ट्री लाइन समाप्त होने के बाद मिले बर्फ से ढंके पर्वत व ग्लेशियर को पैदल पार करते हुए हम थक कर चुके थे । मंदाकिनी की निर्मल धारा में उपभोगी मनुष्य के परिचय के तौर पर बहती खाली बोतले व प्लास्टिक के सामान मन को कष्ट दे रहे थे |
सुबह 5 बजे के चले हम 3 बजे के आसपास केदारनाथ धाम पहुँचे। आसमान में गड़गड़ाते हेलीकाप्टर 10 मिनटों में लोगों को नीचे फाटा या गुप्तकाशी से ऊपर केदारनाथ धाम पहुँचा रहे थे। हम दो पैदल यात्रियों की हालत थकान से खराब थी पर तीसरे मजबूत यात्री सोनू ठीक थे।जैसा कि हिमालय क्षेत्र में होता है दोपहर के बाद बारिश का माहौल बन रहा था बादल घुमड़ते आ रहे थे व कुछ देर में बारिश शुरू भी हो गई।
फोन से पुजारी जी से सम्पर्क करके कमरे में सामान रखने के बाद हम बिस्तर पर ढ़ेर हो गए । करीब एक घण्टे बाद आराम होना शुरू हुआ और हम कुछ खा पीकर ताजादम हो गए । बाहर निकलकर लाइन में लगकर बाबा के दर्शन करके धुरिआए पाँव दर्शन की परम्परा का निर्वाह करके मन्दिर के आसपास घूमने निकले । हर तरफ तबाही के निशान थे बड़े-
बड़े बोल्डर के नीचे कमरे दबे पडे थे । तीन मंजिला धर्मशालाओं के केवल उपरी तल दिख रहे थे ,नीचे की मन्जिलों में दबे शव भी शायद अन्दर ही पड़े थे। मन्दिर कैसे बचा इसका राज मन्दिर के पीछे चकित करती पता नही कहाँ से आई विशालकाय चट्टान में छिपा है ।सेना के एम आई 17 हेलीकाप्टर से लायी बड़ी बड़ी मशीने काम में लगी थीं । निम(Nehru Institute of Mountaineering )के जाबांज यहाँ 12 महीनों रहकर काम करते हैं । एक कर्मचारी ने बताया की मशीनों की नीचे आग जलाकर उन्हें काम लायक रखा जाता है ।
अब सूरज ढलने लगा था कुछ देर में ही अन्धेरा हो गया हम भी अब सोने की तैयारी कर रहे थे । पुजारी जी कमरे में आए और 15 - 16 रजाईयों रखे होने की बात कही तो हमने कहा इतने की क्या जरूरत, पुजारी जी ने कुछ नही कहा पर इतनी रजाईयों का होने का राज बाद में खुलना था।
कमरे में बात चीत करने के दौरान हमारा ध्यान दीवारों पर गया तो वहाँ छत से एक फीट नीचे सभी दीवारों पर एक लकीर सी थी , हम अभी सोच ही रहे थे कि यह क्या है कि सुबह के दर्शन के सिलसिले में बात करने आए पुजारी जी ने बताया कि यह निशान 16 जून की रात आयी जल प्रलय के हैं। कमरों में वहाँ तक कीचड़ युक्त पानी भर गया था । कमरे में सोए लोगों के बारे में सोचकर हम आवाक रह गए ।
अब हम सोने का उपक्रम करने लगे । रात के सन्नाटे में केदारनाथ हिमनद से निकलती मन्दाकिनी ठीक हमारे धर्मशाला के पीछे से बह रही थी रात के सन्नाटे में उनका नाद हमारे रोगटें खड़े कर रहा था । रास्ते भर प्रलय के दृश्य, गिरे भवन उनमें अभी भी दबे लोगों के शव व उनके बीच अधबची हमारी धर्मशाला के इस कमरे में थककर चूर लेटे तीनों लोगों की आँखो से नींद गायब थी । खैर अध्यात्मिक ज्ञान के स्मरण से खुद को साहस देते हमारी आँखे नींद से भारी होने लगी तो पुजारी जी की 15 - 16 रजाईयो का राज खुलने लगा। भय से उबरकर जब हम धरातल पर आये तो अब ठंड की चुनौती सामने थी । बर्फीले पर्वतों के बीच तापमान शून्य से नीचे या आसपास था। एक आदमी चार चार रजाईयों के बोझ से दबा था तब भी ठंड लग रही थी । मई की गर्मी में यात्रा पर निकले हमलोगों के पास ठंड से बचने के कुछ खास था भी नही । सबने अपने पैन्ट इनर शर्ट मोजे पहन लिए फिर भी ठंड से नींद नही आ रहा थी फिर हम सब एक दूसरे सटकर किसी तरह कांपते हुए सोने की कोशिश करने लगे।
अब सुबह बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए हम मैदानी प्राणी नहाने के असमंजस में पड़ गए लेकिन ठंड पर भक्ति भाव हावी रहा ।
पुजारी जी ने गर्म पानी दिया पर उससे खुले में नहाना पड़ा क्योंकि बाथरूम का सीवर पाईप पानी जमने से जाम हो गया था ।सुबह के चार पाँच बजे नहाने का दुस्साहसिक कार्य करके जब हम भोर के धुंधलके में बाहर निकले तो वहाँ का दृश्य देखकर सभी कष्ट गायब हो गए ।
भोर के अन्धेरे में जगमगाता केदारनाथ मंदिर , मन्दिर के पीछे उगते सूर्य की लालिमा में पल पल रंग बदलती बर्फ से लदी केदारनाथ पर्वत श्रृंखला , चारो और फैली असीम शांति व उसे बीच बीच में भंग करती मन्दिर की घंटिया। हम तीनों तो मंत्रमुग्ध से होकर दर्शन हेतु पंक्ति में खड़े थे । यह दृश्य और शान्ति, हमारे गहरे अन्दर तक उतर रही थी ।
सोनू का यह कहने पर 'भैया आपने यह यात्रा कार्यक्रम बनाकर जीवन सफल कर दिया,मैं कुछ कह नहीं पाया पर सोचने लगा कि अपने कुछ कर सकने का सोच पाना भी मूर्खता है इस असीम विराट प्रकृति के आगे हम सब तुच्छ हैं । 3200 मीटर की ऊचाई पर खड़े हम तीन अपने सामने खड़े 5000 मीटर उँचे केदार पर्वत की विराटता में खो से गए । सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था और हर क्षण नया सौन्दर्य उत्पन्न हो रहा था ।
इसी बीच हम मन्दिर में विशाल नन्दी बाबा के दर्शन करते हुए प्रवेश कर गए। । मुख्य मंडप में बाबा केदार प्राकृतिक रूप में हैं । यहाँ उनका स्वरूप पारम्परिक शिवलिंग की तरह नही हैं।
इतने उँचाई व सुदूर स्थान पर पूजन के लिए न बेलपत्र मिल पाया था न फूल । हमारे अमृत जी बेचैन हो गए पर हमें कृत्रिम फूल ही मिल पाए और आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि एक बनारसी को नकली फूल से ज्योतिर्लिंग का दर्शन पूजन करना पड़े तो उसकी स्थिति कैसी होगी ।
अन्दर पुजारी जी मिले, उन्होने प्रसाद में खरीदे गए देशी घी कहकर दिए गए पदार्थ को बाबा केदार के विग्रह पर लगाने को कहा । उन्होंने ही बताया कि यहाँ बाबा के पार्थिव स्वरूप का पूजन होता है अतः जिस प्रकार पार्थिव शरीर पर देशी घी लगाया जाता है उसी तरह यहाँ भी किया जाता है। मैनें देशी घी की तरह, इसलिए कहा क्योंकि बड़ी अजीब बात है कि दुकानों पर पूजा का घी अलग होता है व मनुष्य के खाने का अलग। यहाँ भी बाजारवाद अपना असर दिखाने से बाज नही आया ।
दर्शन पूजन करके हम बाहर आ गए ,बाहर अच्छी खासी धूप हो चुकी थी । हमने कुछ फोटो लिए, पेट पूजा की और उतरने के लिए तैयार हो गए । अब हम आराम से कांपते पैरो से प्रकृति का आनन्द लेते उतर रहे थे। रास्ते में पड़े ग्लेशियरों पर चढ़कर फ़ोटो खिंचवाते, घास व फूलों से भरे मैदानों में लेटते बैठते, झरनों का पानी पीते हम नीचे उतरते गए पर हमारा मन वही रह गया था बाबा केदार के पास । हम अपने साथ ऐसी स्मृतियों को सहेज कर ले जा रहे थे जो सारा जीवन साथ रहने वाली थीं । हाँ पुजारी जी की एक बात भी याद थी "अकेले आये हैं आप लोग,जीवन संगिनि के साथ आएँगे तब तीर्थ यात्रा सफल होगी"। अमृत जी हौसला भर रहे थे कि हाँ अवश्य आएँगे पूरे परिवार के साथ । मैनें भी बाबा केदारनाथ से प्रार्थना की कि वह पुनः ऐसा संयोग उत्पन्न करें हम फिर उनके दर्शन को आ सकें ।
गौरीकुण्ड पहुँचते हुए हम आना जाना लगभग 45 किमी पैदल चल चुके थे अब बारिश भी शुरू हो चुकी आगे लैण्डस्लाइड की खबर थी । पीछे लैण्डस्लाइड में फंसे सोनू किसी तरह चट्टानों को लांघ कर मिल ही गए और हम बद्रीनाथ जी की तरफ बढ़ गए।
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