महिला सशक्तिकरण पर एक संस्मरण...
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर आज कई जगह कार्यक्रम आयोजित हैं | कई जगहों से निमंन्त्रण भी है.....पिछले साल भी ऐसे कई कार्यक्रमों गया था जहाँ वक्ताओं ने महिला सशक्तिकरण के उदाहरण पेश किए....उपाय बताए|.....
पर आज मैं अपना संस्मरण लिखना चाहूँगा....दस साल के ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालय के शिक्षकीय जीवन में जब अनुभवों से शिक्षकीय सरलता बढ़ी तो बच्चों के मनोविज्ञान का भी ज्ञान बढता गया.....तो उसका फायदा यह हुआ कि शिक्षण प्रक्रिया में दण्ड का प्रयोग नगण्य हो गया ...अब साब हालत यह है कि बच्चे लोग बाकायदा डिमाण्ड रखने लगें हैं ......अपनी बात कहने लगें है....| तो घटना यह है कि बच्चे लोग कई दिन से खेल के नए सामानों की जिद कर रहे थे ....लडकियों की माँग बैडमिन्टन की थी तो लड़कों की फुटबाल की.........| तो साब माँग के आगे झुकना पड़ा और सामान आ गया| बच्चे अपने अपने सामानों से रोजे खेलने लगें .....पर इसी बीच हुआ यह कि लड़कों ने बैडमिन्टन पर भी हाथ अजमाना शुरू किया....तो लडकियों ने भी फुटबाल पर दावा पेश किया..... जिसे लड़कों ने हँसकर......मजाक उड़ाने के भाव में यह कहकर उड़ा दिया कि ...लडकियाँ और फुटबाल ...खेल ही नहीं सकती.....|जब लडकियों कि तरफ से विरोध बढने लगा तो हस्तक्षेप करना पड़ा.......तय यह हुआ कि लडकियाँ भी शनिवार को आधा घण्टा खेलेगीं ...तो ..शुरू में तो उन्होंने कुछ हिचकिचाहट दिखाई पर धीरे धीरे .....खेल अच्छा होने लगा...पर साब क्लाईमेक्स तो अभी बाकी है.....हुआ यह कि एक दिन लड़कों ने अपने दम्भ में आकर लडकियों को चैलेन्ज कर दिया .......कुछ हिचक के साथ मैनें भी हामी भर दी |मैच शुरू हुआ .लड़कों ने बढत भी ले ली| दर्शक लड़को ने तो शोर करके मामला लड़के बनाम लड़कियाँ कर दिया ......लडकियों के चेहरे पर एक अजीब भाव दिखा मुझे मैनें पाँच मिनट के लिए खेल रोका व उन्हे अपनी समझ भर कुछ सुझाव दिए..|खेल फिर शुरू हुआ ....तो साब ज्यादा उम्मीद तो मुझे भी नही थी ..पर यह क्या? लडकियों का दौड़ना देखते बनता था| कुछ देर में तो हालत यह हो गई कि लड़के तो बाल ही नही पा रहे थे ...देखते देखते स्कोर भी बराबर हो गया ....अब दर्शक लडकियों ने भी शोर मचाना शुरू कर दिया......लड़के तो चुप से ही हो गए थे.......खिलाड़ी लड़कों मे आपसी झगड़े भी शुरू हो गए.....तो साब नौबत ये आ गयी कि मुझे बीच में आकर मैच ड्रा घोषित करना पड़ा...
थकी हाँफती लड़कियाँ के चेहरे पर एक अलग तरह की चमक थी मानों कह रही हों ....हमें कम मत आँकना....
....पर करते है हम ऐसी गलती...
उन्हे कमजोर मानने की,...करते हैं हम झूठी बातें उन्हे सशक्त बनाने की,
पर असल में डरता है पुरूष....उनकी समायोजन की ताकत से,उनकी सहनशीलता की क्षमता से,उनकी करूणा न क्षमाशीलता की शक्ति से ......इसलिए करता है नाटक भरे तमाम प्रयोजन|
सच्चाई यह है कि हम असक्त उन्हे क्या सशक्त बनाएँगें .....बस उन्हे एक सुरक्षित आकाश चाहिए जहाँ....वह उड़ सके अपने सपनों के साथ....