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गुरुवार, 4 जून 2015

हमारा पर्यावरण :एक परिचय


   ५जून विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक मौका है पर्यावरण को समझने का| पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के 'परि' उपसर्ग
(चारों ओर) और 'आवरण' से मिलकर बना है
जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो
 किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं। अपने परिवेश में हम तरह-तरह के  सजीव-निर्जीव वस्तुएँ पाते हैं। ये सब मिलकर पर्यावरण की रचना करते हैं।
     वायु, जल तथा भूमि निर्जीव घटकों में आते हैं जबकि जन्तु तथा पादपों से मिलकर सजीवों का निर्माण होता है। इन संघटकों के मध्य एक महत्वपूर्ण रिश्ता यह है कि अपने जीवन-निर्वाह के लिए परस्पर निर्भर रहते हैं और इसी निर्भरता पर  पर्यावरण सन्तुलन भी निर्भर है|

   जीव-जगत में मानव सबसे अधिक संवेदनशील प्राणी है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह अन्य जीव-जन्तुओं, पादप, वायु, जल तथा भूमि का दोहन करता है| अतः ज्यादातर पर्यावरणीय समस्याएँ पर्यावरणीय
अवनयन और मानव जनसंख्या और मानव द्वारा
संसाधनों के उपभोग में वृद्धि से जुड़ी हैं।
पर्यावरणीय अवनमन की बात करें तो इसके अंतर्गत पर्यावरण में होने वाले वे सारे परिवर्तन आते हैं जो अवांछनीय हैं और किसी क्षेत्र विशेष में या पूरी पृथ्वी पर जीवन के सन्तुलन को खतरा उत्पन्न करते हैं।
   इसके अंतर्गत प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव
विविधता का क्षरण और अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि शामिल की जाती हैं। पर्यावरणीय अवनमन के साथ जनसंख्या में चरघातांकी दर से हो रही वृद्धि तथा मानव द्वारा अतिउपभोग की लोलुपता,लगभग सारी पर्यावरणीय समस्याओं के मूल कारण हैं।    
    प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य द्वारा अपने आर्थिक लाभ हेतु इतनी तेजी से दोहन किया जा रहा है कि उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण (replenishment) नही
हो पा रहा है और इसके लिये जनसंख्या का दबाव तथा विकास का अवैग्यानिक माडल जिम्मेदार है|